Monday, July 31, 2006

नज़रों से मिलने के इंतेज़ार मे हैं नज़रें....
एक झलक के लिये बेकरार हैं नज़रें
ना जानु कब आये वो लम्हा....
बहुत कुछ कहने को त्यार हैं नज़रें

Wednesday, July 19, 2006

चांद-सितारे और वो....



जगमगाते हैं तारे उनके नूर से...
उनके नूर से रोशन है ये रात...
और वो कह्ते हैं तारे नहीं करते उनसे बात
तारों की नहीं है खता ...
बेज़ुबान कहना तो बहुत कुछ हैं चाह्ते...
पर बस झिलमिला के ही हैं रह जाते



हर रात देखुं चांद को, इक चेहरा नज़र आता है
इक चेहरे मे हर बार चांद सा नूर नज़र आता है...
आंखें हैं कि दोनो मे फ़रक ही नहीं जानती
हर सुरज के निकलते,वो चांद याद सा आता है

Wednesday, July 05, 2006

दिल-ए-गुस्ताख

मैं शायर तो नहीं .. पर फ़िर भी



जब मैने कहा


"इंतज़ार में उनके कांपती हैं आंखें ...
आज तूफ़ानों से नज़र मिल रही है हमारी ...

जब थमेगा तूफ़ान ... बस थम जायेंगी ये आंखें "


जवाब आया


"क्युं खेलते हो तूफ़ानों से....
बैठ के साहिल पर लुत्फ़ उठाओ लेहरों का...
जाने कितने डूबे इन मौज़ों के सफ़ीने में
"


मैं बस इतना ही कह पाया ..


"तूफ़ानों का रुख मोड्ने का दावा नहीं करते ....
पर साहिल पर बैठ कर हम प्यार नहीं करते
"


एक मुस्कुराते चहरे को सोते देखा तो युं लगा ..

" उन सोती आन्खों
में एक मुस्कुराहट है .... लगता है ख्वाबों को जीना सीखा रही हों "




प्यार करके प्यार को जाना हुं मैं .....
दीवाना
नहीं ....
परवाना हुं मैं.....