Monday, August 14, 2006

कुछ अनकही सी...

आज रोना चाहुं, नहीं रोने देता है दिल
इज़हार करना चाहुं, नहीं करने देता है दिल
समझते हैं वो इस दिल की हालत...
क्या समझेंगे इस मोहब्ब्त को? यही पूछता है दिल

मैं कहता हुं उस से, क्युं डरते हो तुम?
जब इतनी पाक मोहब्ब्त करते हो तुम
कहां गयी वो तुम्हारी हिम्मत?
ज़ख्मों को क्युं नहीं भूल पाते हो तुम?

वो जवाब देता है मुझको..

ए नादान, बिन जाने ही इल्ज़ाम लगा दिये
बिन खता के सज़ा भी सुना दिये
काश इक बात तुम जान पाते..
मैं दिल तुम्हारा .... अब धड्कता हुं उनके लिये..
..............धड्कता हुं उनके लिये..