Friday, April 25, 2008

अनामिका

गलत हुं मैं .... सही हो तुम
जानता हुं मैं .... ना जानो तुम
उस कल में मैं .... इस आज में तुम
बेचैन सा मैं .... अन्जान हो तुम

रुका सा मैं .... रेत हो तुम
शब्द में मैं .... गज़ल में तुम
ये लम्हा मैं .... हर लम्हा तुम
गुमनाम सा मैं .... अनामिका हो तुम...

Tuesday, April 22, 2008

इंतज़ार

इक रात मेरे अंदर,
आफ़ताब की तलाश में
अब्र किसका लिए इन आंखॊं में,
अशुफ़्ता सा जिये जा रहा हुं

आसिम भी मान लिया खुद को,
अपने खुदा के दरबार में
तबस्सुम ना जाने किसका,
ज़हन से जाता ही नहीं है

मय से मकसूद सिर्फ़ इतना,
लिखवाती है वो बेकरारी में
नज़्म लिख रहा मैं होश में,
कुछ जवाबॊं का इंतज़ार है....