Friday, June 05, 2009

चार कटोरी आशाऎं

कुछ चार साल पहले
एक मटका लिया हमने
गोल सा सुंदर सा

"आशाओं का मटका ..साहब जी"
बोला वो दुकानदार
"क्यूं ठगते हो भैया ?...खाली है ये"
"आशाऎं आपकी ..आपको भरनी होंगी"

बडे चाव से हम उसे घर लाये
और चार कटोरी आशाऎं उसमे डाल कर
रख दिया सजा के एक कोने में

फ़िर आया नाकामयाबी क दौर

हर हार पर हमने चार आंसु बहाये
कुछ दिन उसके दुख में चार आंसु और बहाये
सबको समेट कर डालते गए उसमें
बूंद बूंद कर ना जाने कब भर गया मटका..

आलम ये है आज

एक ग्लास झुंझलाहट रोज़ डालते हैं
झूठे ही आशाओं की नदी बहाते हैं

बाहर से शांत दिखता है मटका
अंदर ना जाने कितने संग्राम उफ़ान मारते हैं

आज़ादी!!
आज़ादी!!
मुक्ती...

दिल करता है पटक कर तोड दें इसे
पर हम एक कंकड हौले हौले से मारते हैं...

1 comment:

Voice said...

i know what r u talking abt :D

no comments :)