Friday, June 19, 2009

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मिली जो माटी बुन्देलखंड की
चम्बल के खारे पानी में
बनी एक मूरत पहचानी सी
कच्ची सी मिट्टी
मिट्टी की मूरत

सतपुडा के आंचल में
जोहिला के पानी से
हाडोत के तप में
निखरी वो मूरत
पक्की हुई मिट्टी
मिट्टी की मूरत

काली का आशिर्वाद
नर्मदा का सर पर हाथ
नन्दी की धरती पर
खडी ये मूरत
सोचे है आज

एक छाप है उसपे संसार की
क्या निशां छोडेगी वो जहां पर?
मिट्टी से बनी थी
मिट्टी में जा मिलेगी
एक मिट्टी की मूरत
एक मिट्टी का इन्सां...





२६ :-)

5 comments:

commited to life said...

thought provoking..

एक छाप है उसपे संसार की
क्या निशां छोडेगी वो जहां पर?
मिट्टी से बनी थी
मिट्टी में जा मिलेगी
एक मिट्टी की मूरत
एक मिट्टी का इन्सां...

happy 26th..
:)

Bride2bee said...

Nice :)

touched a chord, somewhere within..

Thanks for dropping by !

Still thinking said...

Happy B'day :)

Prakhar said...

@Deepshikha

Thank you:) (rest of the poem doesnt make much sense w/o it)

@Bride2bee

Thanks...it was fun reading your blog :)..keep writing!

@Still thinking

Thanks :)

Voice said...

good one...
fundu