Friday, April 23, 2010

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तितलियों के पंखों से निकले रंग
लगे हैं मेरी हथेली पर
महुए की महक में लगता है
होली मैं भी खेला हूं ज़रा ज़रा

घडी के घूमते कांटों की आवाज़
गूंज रही है इस घर में
उस खुली खिडकी से आती ठंडी हवा
कर रही है बेचैन मुझे
कभी इस करवट कभी उस करवट
सोया हूं मैं ज़रा ज़रा

बारिश जो हुई कल रात
रिस रही है दिल में आज
एक तस्वीर को लगा सीने से
भीगा हूं मैं भी ज़रा ज़रा...
... ज़रा ज़रा
तेरे इंतज़ार में
... ज़रा ज़रा
तेरे प्यार में