Monday, November 08, 2010

एक गुज़ारिश

देखता हूं तुम्हे...
आंखों के कोने से... एक नज़र चुरा के
देखता हूं तुम्हे...
बातों ही बातों में ना जाने किस बात पर मुस्कुराते
देखता हूं तुम्हे...
चाय क प्याला लिये...ख्यालों में खोते हुए
देखता हूं तुम्हे...
इस खिडकी पर खडे...आसमां से बतियाते
देखता हूं तुम्हे...
इस दरवाज़े से आते जाते
देखता हूं तुम्हे...
इस घर को सजाते

एक गुज़ारिश उस खुदा से
अब लौट आओ तुम
देखता हूं तुम्हे...खोजता हूं तुम्हे
इन तन्हाइयों में..