Saturday, December 15, 2012

तीन से चार



रात के तीन बजे...मैं जाग रहा हूं
एक तस्वीर को ज़हन में ही बना रहा हूं
हां वो तुम्हारी ही तस्वीर है
लेकिन ना जाने क्यूं...मैं बना ही नहीं पा रहा हूं
एक नाम भी सोच रहा हूं
हां तुम्हारा ही नाम...जिससे मैं तुम्हे पुकारूंगा
एक प्यारा सा नाम सोच रहा हूं
...तब तक तुम्हे अनामिका ही पुकारूंगा

रात के साढे तीन बज रहे हैं...और मैं जाग रहा हूं
गुलज़ार साहब की कवितायें रखी हैं सिरहाने
सोच रहा हूं वही पढ लूं
मिटेगी ये बेकरारी...सुकून आयेगा इस दिल को...
तो शायद इन खुली आंखों में भी नींद आ जाये...

मैं सो जाऊंगा अनामिका
लेकिन एक शर्त है...
कल रात की तरह...गर तुम आओ मेरे ख्वाबों में
तो रुकना कुछ देर...एक नज़र भर के देख लूंगा तुम्हे
कुछ बातें भी करेंगे
और गर कहीं जल्दी हो जाना तुम्हे...
तो कम से कम अपना नाम ही बता जाना...

पूरे चार बज रहे हैं रात के..
और करने तुम्हारा ख्वाबों में इंतज़ार
मैं अब सोने जा रहा हूं....
अनामिका...तुम आओगी ना?

Friday, July 06, 2012

कागज़ का कतरा



सडक पर उडता एक कागज़ का कतरा
कागज़ का कतरा निकला एक किताब से?
कहानी को अधूरी छोड उडा जा रहा है
कागज़ का कतरा निकला एक डायरी से?
सूखे फ़ूलों की खुशबू को इस आलम में बिखरा रहा है
पुरज़ा है उस आखिरी खत का?
उन नम आंखों के चंद आंसू लिये उडा जा रहा है
एक कागज़ का कतरा सडक पर उडा जा रहा है

वो कागज़ का कतरा मेरी ओर उडा आ रहा है
आके यूहीं लिपट गया है मेरे पैरों से
उठा के देखा जब...पलट के देखा जब
एक बेकरारी सी बढने लगी
जेब मे रखी कलम में, स्याही लाल भरने लगी
यूहीं लिख दिये कुछ शब्द उस कोरे कतरे पर

सोचा की सहेज के रख लूं इसे...
उस कतरे की आज़ादी पर फ़डफ़डाने लगी..
एक और उडान नज़र सी आने लगी..
तो मैनें उडा दिया वो कागज़ का कतरा
एक खूबसूरत गज़ल लिये उडा जा रहा है
कागज़ का कतरा ...बेफ़िक्र सा उडा जा रहा है....


Friday, April 27, 2012

रंग


हाथ यूं ही जो थामा तुमने
कुछ गुलाबी सी हो गयी है शाम आज
देखो बदल रहा है रंग पूनम का चांद आज
सीने पर रख कर सर..सुनती हूं धडकन तुम्हारी
गालों पर चढ रहा है रंग लाल तेरे नाम का

आज तुम जो हो मेरे साथ...
नहीं दिखता वो पूनम का चांद...
नूर-ए-चश्म से ही रोशन है ये रात
बेताब ये दिल...करे ऐसी सुबह क इन्तज़ार
हर धडकन पर करे यही फ़रियाद
तेरे नैनों से रंग दे...रंग दे मेरा हर नीला आसमां


इसके एक रंग में मिला एक रंग मेरा भी
ओ रंगरेज़! बना एक रंग ऐसा भी..
कुछ अलग सा रंग....कुछ नया सा रंग
होगा वो अनदेखा सा रंग...एक अनसुना सा रंग
रंग हमारे इश्क का...रंग हमारे प्यार का

Tuesday, February 28, 2012

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कहते हैं दोस्त है मेरा..हमसाया है
कहीं वो दुश्मन तो नहीं?

बहला के यूं दिल को
ठगता वो दिमाग को

धुंधला के पुरानी यादों को
दिखाता नये ख्वाब वो

अंधेरे मे जलते दिये सा
अंधेरे मे बुझते दिये सा

कमबख्त
कभी लगता रब सा
कभी लगता सब सा

खेले हर बार एक नया खेला
घुमा के ज़िंदगी को चक्करों मे
हंसता यूं मुझपे
हंसता मेरा नसीबां....

Thursday, February 09, 2012

जूनूनी

अजी कमाल है ज़िन्दगी
कुछ बावरी सी ज़िन्दगी
कुछ मलंग सी ज़िन्दगी

ढलते सूरज के साथ
करे सुबह क इन्तज़ार
ख्वाब बुनती ज़िन्दगी

गिरते आसमां के पार
ढूंढे एक नया आकाश
नादान सी ज़िन्दगी

आज तक जो चली अकेली
अब चाहे एक हमसफ़र क प्यार
अधूरी सी ज़िन्दगी

थक कर, रुक कर, गिर कर, आज इस हार के बाद
कल फिर जीने को बेकरार
ये जूनूनी ज़िन्दगी