Friday, July 06, 2012

कागज़ का कतरा



सडक पर उडता एक कागज़ का कतरा
कागज़ का कतरा निकला एक किताब से?
कहानी को अधूरी छोड उडा जा रहा है
कागज़ का कतरा निकला एक डायरी से?
सूखे फ़ूलों की खुशबू को इस आलम में बिखरा रहा है
पुरज़ा है उस आखिरी खत का?
उन नम आंखों के चंद आंसू लिये उडा जा रहा है
एक कागज़ का कतरा सडक पर उडा जा रहा है

वो कागज़ का कतरा मेरी ओर उडा आ रहा है
आके यूहीं लिपट गया है मेरे पैरों से
उठा के देखा जब...पलट के देखा जब
एक बेकरारी सी बढने लगी
जेब मे रखी कलम में, स्याही लाल भरने लगी
यूहीं लिख दिये कुछ शब्द उस कोरे कतरे पर

सोचा की सहेज के रख लूं इसे...
उस कतरे की आज़ादी पर फ़डफ़डाने लगी..
एक और उडान नज़र सी आने लगी..
तो मैनें उडा दिया वो कागज़ का कतरा
एक खूबसूरत गज़ल लिये उडा जा रहा है
कागज़ का कतरा ...बेफ़िक्र सा उडा जा रहा है....


2 comments:

Voice said...

bahut badhiya... bahut khoob

Anonymous said...

beautiful as ever
how do u manage to give words to the most ordinary things...