Tuesday, December 31, 2013

क़लम

ये नीली स्याही वाली क़लम
आज कुछ लिखना चाहती है

खूब सारे अल्फ़ाज़ हैं इस दिल में
उन सब को पिरो के, एक खूबसूरत ग़ज़ल लिखना चाहती है
ये नीली स्याही वाली क़लम
आज कुछ...

आज ये एक कहानी भी लिखना चाहती है
कुछ अनसुने किस्से बयाँ करना चाहती है
चन्द संजीदा किरदारो को उभारना चाहती है
ज़िंदगियो पर अपना निशाँ जो छोड़े
एसी यादगार एक कहानी लिखना चाहती है
ये नीली स्याही वाली क़लम
आज कुछ...

कोशिश है पूरी की कुछ अच्छा लिखे
चाहे उसमें कितना भी वक़्त लगे
वो बेताब है....बेक़रार है
इस कोरे काग़ज़ को अपने रंग में रंगना चाहती है
ये नीली स्याही वाली क़लम
आज कुछ लिखना चाहती है

Sunday, December 29, 2013

मील का पत्थर

क्या ये अन्धी दौड़ है ?
या एक काली सुरंग ?
अभी एक मील का पत्थर गुज़रा
देख ही नहीं सका क्या लिखा था
कितनी दूर है मेरी मंज़िल
कब पहुँचुँगा वहाँ ?
शायद जब पहुँचूं तब आखें कुछ कमज़ोर हो चुकी होँगी
बदन कुछ थक सा गया होगा
तब ये छोटे मील के पत्थर भी याद ना आएँगे
और शायद अगला पड़ाव भी ना दिखे

क्या करूँ? कुछ देर रुक जाऊँ
सांस ले लूँ जी भर के?
या चलता जाऊँ उस आख़िरी मक़ाम की ओर ?

ये सफ़र अब कुछ अज़ीब सा लगने लगा है
इन सवालो का जवाब क्या देगा कोई ?
कशमकश मेरी क्या समझेगा कोई ?