Sunday, December 29, 2013

मील का पत्थर

क्या ये अन्धी दौड़ है ?
या एक काली सुरंग ?
अभी एक मील का पत्थर गुज़रा
देख ही नहीं सका क्या लिखा था
कितनी दूर है मेरी मंज़िल
कब पहुँचुँगा वहाँ ?
शायद जब पहुँचूं तब आखें कुछ कमज़ोर हो चुकी होँगी
बदन कुछ थक सा गया होगा
तब ये छोटे मील के पत्थर भी याद ना आएँगे
और शायद अगला पड़ाव भी ना दिखे

क्या करूँ? कुछ देर रुक जाऊँ
सांस ले लूँ जी भर के?
या चलता जाऊँ उस आख़िरी मक़ाम की ओर ?

ये सफ़र अब कुछ अज़ीब सा लगने लगा है
इन सवालो का जवाब क्या देगा कोई ?
कशमकश मेरी क्या समझेगा कोई ?

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