Tuesday, September 30, 2014

मकान

नींव में इसके हैं चंद अठन्नीयां
रोज़ दो मील चल के जो बचायी थीं

इस संगमरमर के फ़र्श को
जोडे हुए है वो नीली शर्ट का रफ़्फ़ू

और ये देखिये क्या आलिशां झूमर
उन कलाईयों की सादी कांच की चूडियों से रंगा है

और ये बैठक की दिवारों पर चढा हल्का गुलाबी रंग
मानो सुर्ख लाल में पसीने की कुछ बूंदे घुल गई हों

किसी ने बताया की आज ग्रह-प्रवेश है!
आज इस मकान को ज़िंदगी मिल रही है?
इस मकान को तो ज़िंदगी मिल चुकी है
ज़िंदगियां उन दोनो की....

Sunday, August 31, 2014

जनवरी

अल्साई पलकों को हल्का सा खोल
देखती है एक नज़र घडी कि ओर
कल रात के चांद का खुमार अभी बाकी है
और आज का सूरज छुपा बैठा है मख्मली रज़ाइ मे
मुस्कुरा के वो...फ़िर से रंगने लगती है सपनों को

रुक जाती है काम करते करते
घुंघराली लटों को उंगलियों में बुनते बुनते
उठी एक चाहत इस पल
... कि बांट सकूं तुम्हारे साथ
ये चाय का प्याला
ये रिमझिम सी बारिश
... कि बांट सकूं तुम्हारे साथ
ये पल ... ये चाहत

घडी में आधी रात हो गई....तारीख बदल रही है
उस पुरानी डायरी में आज का दिन संजो के रख रही है
थकी हुई पलकें नए सपनों का कैनवास तैयार कर रही हैं

यूं ही गुज़र गया एक दिन और
वो बढ चली एक नए दिन की ओर
आने वाली सर्दियों कि ओर
आने वाली जनवरी कि ओर


Monday, August 18, 2014

सिटीलाइट्स


ज़रा सा आस्मां दिखता है
ज़रा सा चांद दिखता है
इस बाल्कनी में बैठे हुए
ज़रा से ये शहर भी दिखता है

सडक पर चलती गाडियां
सैकडों लम्बी इमारतें
हज़ारों खिडकियां और उनमें जलती लाखों लाइटें
शाम होते ही जगमगा उठा ये शहर
हर शाम एक नया शहर दिखता है

अब धीरे धीरे, एक एक कर बुझ रही हैं लाइटें
एक अन्धेरे की ओर जा रहा है ये शहर
पर सवाल जो ज़हन को मरोड रहा है वो ये कि
इतने बडे शहर में
इस चकाचौंध में
सातवें माले से भी
कोई इंसां क्यूं नहीं दिखता है?