Monday, August 18, 2014

सिटीलाइट्स


ज़रा सा आस्मां दिखता है
ज़रा सा चांद दिखता है
इस बाल्कनी में बैठे हुए
ज़रा से ये शहर भी दिखता है

सडक पर चलती गाडियां
सैकडों लम्बी इमारतें
हज़ारों खिडकियां और उनमें जलती लाखों लाइटें
शाम होते ही जगमगा उठा ये शहर
हर शाम एक नया शहर दिखता है

अब धीरे धीरे, एक एक कर बुझ रही हैं लाइटें
एक अन्धेरे की ओर जा रहा है ये शहर
पर सवाल जो ज़हन को मरोड रहा है वो ये कि
इतने बडे शहर में
इस चकाचौंध में
सातवें माले से भी
कोई इंसां क्यूं नहीं दिखता है?

3 comments:

Voice said...

back with a bang
Good one Prakhar

Prakhar said...

Thanks Bhav!

Poorvi said...

Too Good