Sunday, August 31, 2014

जनवरी

अल्साई पलकों को हल्का सा खोल
देखती है एक नज़र घडी कि ओर
कल रात के चांद का खुमार अभी बाकी है
और आज का सूरज छुपा बैठा है मख्मली रज़ाइ मे
मुस्कुरा के वो...फ़िर से रंगने लगती है सपनों को

रुक जाती है काम करते करते
घुंघराली लटों को उंगलियों में बुनते बुनते
उठी एक चाहत इस पल
... कि बांट सकूं तुम्हारे साथ
ये चाय का प्याला
ये रिमझिम सी बारिश
... कि बांट सकूं तुम्हारे साथ
ये पल ... ये चाहत

घडी में आधी रात हो गई....तारीख बदल रही है
उस पुरानी डायरी में आज का दिन संजो के रख रही है
थकी हुई पलकें नए सपनों का कैनवास तैयार कर रही हैं

यूं ही गुज़र गया एक दिन और
वो बढ चली एक नए दिन की ओर
आने वाली सर्दियों कि ओर
आने वाली जनवरी कि ओर


2 comments:

Best Efforts said...

ham bhi intjar kar rahe hai is january ka.

commited to life said...

:)